उनकी जुबां पे ताले पड़े हैं

राजेश त्रिपाठी
सदियां गुजर गयीं पर, तकदीर नहीं बदली।
मुफलिस अब तलक जहान में, पीछे खड़े हैं।।

औरों का हक मार कर, जो बन बैठे हैं अमीर।
उन्हें खबर नहीं कैसे-कैसे लोग तकदीरों से लड़े हैं।।

पांव में अब तलक जितने भी छाले पड़े हैं।
वे न जाने कितने बेबस लिए नाले खड़े हैं।।

कोई रहबर अब तो राह दिखलाए ऐ खुदा।
जिंदगी के दोराहे पे , हम जाने कबसे खड़े हैं।।

उनको अपनी शान-शौकत की बस है फिकर।
कितने गरीब मुसलसल, बिन निवाले के पड़े हैं।।

उनकी दहशत, उनके रुतबे का है ये असर।
मजलूम खामोश हैं, उनकी जुबां पे ताले पड़े हैं।।

चौराहे पे भीख मांगता है, देश का मुस्तकबिल।
उनको क्या फिकर, जिनके जूतों में भी हीरे जड़े हैं।।

मुल्क का माहौल अब पुरअम्न कैसे हो भला।
हैवान जब हर सिम्त हाथों में लिये खंजर खड़े हैं।।

किसी बुजुर्ग के चेहरे को जरा गौर से पढ़ो।
हर झुर्री गवाह है, वो कितनी आफतों से लड़े हैं।।

आप अपनी डफली लिए, राग अपना छेड़िए।
छोड़िए मुफलिसों को , आप तकदीर वाले ब़ड़े हैं।।

चांदी-सोने की थाल में जो जीमते छप्पन प्रकार।
खबर उनकी नहीं, जिंदगी के लिए जो कचडों से भिड़े हैं।।

आपका क्या, मौज मस्ती, हर मौसम त्यौहार है।
कुछ नयन ऐसे हैं, जिनके हिस्से सिर्फ आंसू ही पड़े हैं।।

इनसान होंगे जो इनसानों की मुश्किल जानते।
आप तो लगता है कि इनसानों से भी बड़े हैं।
* नाले = विलाप, चीख-पुकार
* पुरअम्न = शांतिपूर्ण

किरन देवी

नाम: किरन देवी

पिता का नाम: श्री भइयालाल

जन्म तिथि :15/10/1988

जन्म स्थान: चित्रकूट(उ.प्र.)

शिक्षा: MA.BEd.NET(HINDI)

संप्रति: सहायक प्रोफेसर,अभिनवप्रग्या महाविद्यालय हमीरपुर

प्रका:शन: साहित्य-कुञ्ज,राजस्थान पत्रिका, सम्भाव्य आदि

पता चित्रकूट(उ.प्र.)

ई मेल: ykiran077@gmail.com

जनवादी काव्य-सर्जक केदारनाथ अग्रवाल

 

डॉ. आनंद कुमार यादव 

कवि चेतन सृष्टि के कर्ता हैं । हम कवि लोग ब्रह्मा हैं ।

कवि को महाकाल मान नहीं सकता । मैं उसी की लड़ाई लड़ रहा हूँ । – केदारनाथ अग्रवाल

कमासिन गाँव, बाँदा, उत्तर प्रदेश के पिता हनुमान प्रसाद अग्रवाल और माता घसिट्टो देवी के घर 1 अप्रैल, 1911 को केदारनाथ अग्रवाल जी का जन्म हुआ। केदार जी के पिताजी स्वयं कवि थे और उनका एक काव्य संकलन ‘मधुरिम’ के नाम से प्रकाशित भी हुआ था। केदार जी का आरंभिक जीवन कमासिन के ग्रामीण माहौल में बीता और शिक्षा दीक्षा की शुरूआत भी वहीं हुई। तदनंतर अपने चाचा मुकुंदलाल अग्रवाल के संरक्षण में उन्होंने शिक्षा पाई। क्रमशः रायबरेली, कटनी, जबलपुर, इलाहाबाद में उनकी पढ़ाई हुई। इलाहाबाद में बी.ए. की उपाधि हासिल करने के पश्चात् क़ानूनी शिक्षा उन्होंने कानपुर में हासिल की। तत्पश्चात् बाँदा पहुँचकर वहीं वकालत करने लगे थे। अपने बचपन और घर के साहित्यिक माहौल व काव्य के प्रति उनकी रुचि जागने के बारे में एक साक्षात्कार में केदारजी ने स्वयं यों बताया है – “कविता मेरे घर में पहले से थी । मेरे पिता ब्रजभाषा और खड़ी बोली में कविता लिखते थे । मेरी चौपाल में आल्हा संगीत होता था । मेरे मैदान में रामलीला खेली जाती थी । उसका प्रभाव मन-मस्तिष्क पर पड़ता था । कविता में मेरी रुचि बढ़ने लगी और मैंने पद्माकर, जयदेव और गीत गोविंद पढ़ा । इसी तरह की मानसिकता बनने लगी । गाँव में और कोई सुख नहीं था, खाओ, पीओ और स्कूल जाओ । इस तरह कविता मेरे अंदर पैठ गई और वह मेरे इंद्रियबोध को संवेदनशील बनाने लगी और अपने को व्यक्त करने की लालसा जागृत करने लगी कि मैं भी कुछ लिख सकूँ तो अच्छा लगेगा । गाँव का वातावरण, चार-चार गाँव का तालाब, हिरन का दौड़ना, देखना, खेत-खलिहान में जाना । नगर-दर्शन भी होता था । मिडिल तक स्कूल था । टीचर मेरे घर आते थे । भीतर-बाहर इस तरह कविता का संसार, मोहक संसार लगने लगा । सौंदर्य को, मानवीय सौंदर्य को, प्रकृति के सौंदर्य को देखने की लालसा जगी । उस समय नौतिकता-अनैतिकता का बोध तो था नहीं, यह तो बाद की चीजें थीं ।

केदार जी की लेखनी से जिस समय काव्य सर्जना होने लगी थी तब आजादी-आंदोलन ज़ोरों पर था । यह वही दौर था जिस समय सामाजिक आर्थिक परिस्थितियों ने एक नए मध्य वर्ग को जन्म दिया था । देश की आर्थिक दशा संतोषजनक नहीं थी । अंग्रेज शासकों की दोहन की नीति की वजह से कई विडंबनात्मक परिस्थितियाँ मौजूद थीं । जिस समय केदर जी अपनी लेखनी चलाने लगे थे, लगभग उन्हीं दिनों में प्रगतिशील चेतना का उदय हुआ था प्रगतिवादी आंदोलन की वजह से । 1936 में लखनऊ में प्रेमचंद की अध्यक्षता में प्रगतिशील लेखक संघ का अधिवेशन भी सुसंपन्न हुआ था ।

केदार जी की काव्य-यात्रा का आरंभ लगभग 1930 से माना जा सकता है । आरंभिक 5-6 वर्षों में उन्होंने जो भी कविताएँ लिखी हैं, उन्हें देखने का अवसर मुझे नहीं मिला है, मगर इस संबंध में विद्वानों की राय यही है कि उस समय की उनकी कविताएँ प्रेम और सौंदर्य पर केंद्रित थीं । अशोक त्रिपाठी जी ने उन्हें “केवल भाववादी रूझान की कविताएँ” माना है ।

केदारनाथ अग्रवाल जी को प्रगतिशील कवियों की श्रेणी में बड़ी ख्याति मिली है । कविता के अलावा गद्यलेखन में भी उन्होंने रुचि दर्शायी थी, मगर काव्य-सर्जक के रूप में ही वे सुख्यात हैं । इनकी प्रकाशित ढ़ाई दर्जन कृतियों में 23 कविता संग्रह, एक अनूदित कविताओं का संकलन, तीन निबंध संग्रह, एक उपन्यास, एक यात्रावृत्तांत, एक साक्षात्कार संकलन और एक पत्र-संकलन भी शामिल हैं।

उनका पहला काव्य-संग्रह ‘युग की गंगा’ देश की आज़ादी के पहले मार्च, 1947 में प्रकाशित हुआ। हिंदी साहित्य के इतिहास को समझने के लिए यह संग्रह एक बहुमूल्य दस्तावेज़ है। केदारनाथ अग्रवाल ने मार्क्सवादी दर्शन को जीवन का आधार मानकर जनसाधारण के जीवन की गहरी व व्यापक संवेदना को अपने कवियों में मुखरित किया है। कवि केदारनाथ की जनवादी लेखनी पूर्णरूपेण भारत की सोंधी मिट्टी की देन है। इसीलिए इनकी कविताओं में भारत की धरती की सुगंध और आस्था का स्वर मिलता है।

केदार जी की प्रकाशित कृतियों की सूची

काव्य-संग्रह – युग की गंगा (1947), नींद के बादल (1947), लोक और आलोक (1957), फूल नहीं रंग बोलते हैं (1965), आग का आईना (1970), गुलमेहंदी (1978), आधुनिक कवि-16 (1978) पंख और पतवार (1980), हे मेरी तुमा (1981), मार प्यार की थापें (1981), बंबई का रक्त-स्नान (1981), कहें केदार खरी-खरी (1983 – सं.-अशोक त्रिपाठी), आत्म-गंध (1988), अनहारी हरियाली (1990), खुली आँखें खुले डैने (1993), पुष्प दीप (1994), वसंत में प्रसन्न हुई पृथ्वी (1966 – सं. – अशोक त्रिपाठी), कुहकी कोयल खड़े पेड़ की देह (1997 – सं. – अशोक त्रिपाठी), प्रतिनिधि कविताएँ (2010 – सं. – अशोक त्रिपाठी)

अनुवाद – देश-देश की कविताएँ (1970),

उपन्यास – पदिया (1985), यात्रा-वृत्तांत – बिस्ती खिले गुलाबों की (रूस की यात्रा का वृत्तांत – 1975), पत्र-साहित्य – मित्र-संवाद (1991 – सं.- रामविलास शर्मा, अशोक त्रिपाठी) साक्षात्कार – मेरे साक्षात्कार (2009 – सं.- नरेंद्र पुंडरीक)

सम्मान

सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, हिंदी संस्थान पुरस्कार, तुलसी पुरस्कार, मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार आदि।

इनकी मृत्यु 22 जून, 2000 को हुई।

केदारजी को जब हम प्रगतिवादी आंदोलन के साथ जुड़े हुए देखते हैं तो हम यही मानते हैं कि वे प्रगतिशील धारा के ही कवि है । मगर सत्तर साल के उनके विराट काव्य सृजन को परखने पर यह तथ्य उजागर हो जाता है कि उनका काव्य-संसार काफ़ी व्यापक है, जिसमें अनंत सृष्टि समाविष्ट है । उनकी कविता की अंतर्वस्तु को यदि हम व्यापक नज़र से देखेंगे तो स्पष्ट है कि प्रेम और प्रकृति सौंदर्य की कविताओं से आरंभ करके उन्होंने जनवादी चेतना को अपनाकर शोषित पीड़ित मानवता के उद्धार के लिए अपनी कविताओं के दायरे को मानवीय समाज के उपेक्षित कई वर्गों तक फैलाने का विनम्र प्रयास किया है । उनके काव्य में अभिव्यक्त प्रेम की भावना का विस्तार पत्नी प्रेम, प्रकृति के प्रति अनुराग और श्रमिक वर्ग के साथ उनकी संवेदना जुड़ जाने से श्रम-सौंदर्य के प्रति अमिट श्रद्धा भी उत्पन्न हुई है । केदारजी के काव्य के विभिन्न आयामों को परखते समय हमें उनके काव्य की इंद्रधनुषीय आभा से गुजरने का मौका मिलेगा ।

प्रकृति-आराधक कवि केदारजी के आराध्य प्राकृतिक तत्वों की संख्या भी असीमित है – धरती-आसमान, सूरज-चंद्रमा-तारें, प्रभात-संध्या, दिन-रात, हवा-पानी, नदी-नाले, खेत-खलिहान, पशु-पक्षी, ईंट-पत्थर, स्त्री-पुरुष, बच्चे-बड़े-बूढ़े हर कोई उनकी विस्तृत सूची में शामिल हैं । इनके अलावा उनकी समूची कविता-साधना पर हम नज़र डालें तो स्पष्ट है कि लोकतंत्र, राजतंत्र-तानाशाही, हर किसी चीज़, हर कोई तत्व, हर कोई तंत्र पर उन्होंने लेखनी चलाई है । मानवता के महान पुजारी के रूप में उन्होंने मानव के श्रेष्ठतम स्वरूप को पेश करने का प्रयास किया है । श्रम शक्ति को श्रेष्ठतम साबित करने के क्रम में उन्होंने सभी क्षेत्रों के श्रमिकों का राष्ट्र के उद्धार के लिए विराट योगदान को अंकित करने के साथ-साथ उनमें अटूट आस्था भरने की विराट चेष्टा की है ।

जिंदगी कोवह गढ़ेंगे जो शिलाएँ तोड़ते हैं,

जो भगीरथ नीर की निर्भय शिराएँ मोड़ते हैं ।

यज्ञ को इस शक्ति-श्रम के

श्रेष्ठतम मैं मानता हूँ ।”

(‘जो शिलाएँ तोड़ते हैं ’/9.11.1948 – प्रतिनिधि कविताएँ)

शोषितों-पीड़ितों का पक्ष लेते हुए उन्होंने तमाम वर्गों को समेटा और पूँजीपतियों और महाजनों को आड़े हाथों लिया । अपनी लेखनी से उन्होंने किसान की अनन्य आराधना की है ।

“मैं तो तुमको मान मुहब्बत सब देता हूँ

मैं तुम पर कविता लिखता हूँ

कवियों में तुमको लेकर आगे बढ़ता हूँ

असली भारत पुत्र तुम्हीं हो

असली भारत पुत्र तुम्हीं हो

मैं कहता हूँ ।

प्रकृति-सौंदर्य की उपासन

केदारजी प्रकृति-सौंदर्य के विराट एवं विशिष्ट उपासक हैं । प्रकृति के रमणीय भावना-चित्रों की प्रस्तुति में केदारजी बोजोड़ कवि हैं । प्रकृति के साथ सहज भावनात्मक अनुभूतियों को जोड़कर उन्होंने जितनी भी कविताएँ लिखी हैं, उनमें अधिकांश कविताएँ पाठकों में वही भावानुभूती पैदा करने में सक्षम हैं । उनकी कविता ‘बसंती हवा’ का रसास्वदन करने वाले किसी भी पाठक में अंश मात्र भी प्रकृति-प्रेम जागृत नहीं होता है, तो वहाँ केदारजी की असफलता ही मान सकते हैं । सच्चाई में, ऐसा होना संभव ही नहीं है । बसंती हवा के वर्णन में कवि की तन्मयता कविता को बार-बार पढ़कर ही समझी जा सकती है । तो आईए आनंद लेते है उनकी एक कालजयी रचना

हवा हूँ हवा मैं बसंती हवा हूँ

सुनो बात मेरी अनोखी हवा हूँ

बड़ी बावली हूँ

बड़ी मस्तमौला।

नहीं कुछ फ़िकर है

बड़ी ही निडर हूँ

जिधर चाहती हूँ

उधर घूमती हूँ

मुसाफिर अजब हूँ।

न घर बार मेरा

न उद्देश्य मेरा

न इच्छा किसी की

न आशा किसी की

न प्रेमी न दुश्मन

जिधर चाहती हूँ

उधर घूमती हूँ

हवा हूँ हवा मैं

बसंती हवा हूँ।

जहाँ से चली मैं

जहाँ को गई मैं

शहर गाँव बस्ती

नदी खेत पोखर

झुलाती चली मैं

हवा हूँ हवा मैं

बसंती हवा हूँ।

चढ़ी पेड़ महुआ

थपाथप मचाया

गिरी धम्म से फिर

चढ़ी आम ऊपर

उसे भी झकोरा

किया कान में ”कू”

उतर कर भगी मैं

हरे खेत पहुँची

वहाँ गेहुँओं में

लहर खूब मारी।

पहर दो पहर क्या

अनेकों पहर तक

इसी में रही मैं।

खड़ी देख अलसी

मुझे खूब सूझी

हिलाया झुलाया

गिरी पर न अलसी

इसी हार को पा

हिलाई न सरसों

झुलाई न सरसों

हवा हूँ हवा मैं

बसंती हवा हूँ।

मुझे देखते ही

अरहरी लजाई

मनाया बनाया

न मानी न मानी

उसे भी न छोड़ा

पथिक आ रहा था

उसी पर ढकेला

हँसी ज़ोर से मैं

हँसी सब दिशाएँ

हँसे लहलहाते

हरे खेत सारे

हँसी चमचमाती

भरी धूप प्यारी

बसंती हवा में

हँसी सृष्टि सारी।

हवा हूँ हवा मैं

बसंती हवा हूँ।

काकी की चाकी(कहानी)

शालिनी साहू
ऊँचाहार,रायबरेली(उ०प्र०)
Shalinisahu15aug@gmail.com

रात में खाने के बाद हर कोई टहलने के लिए सड़क पर निकल चुके हैं टहलने के बहाने ही जरा सा वक्त अपनों के मध्य बीतता है वरना वर्तमान की आपाधापी में समय कहाँ शेष है किसी के पास
सम्बन्धों में अब वो आत्मीयता कहाँ बस हर कोई रोटी,कपड़ा और मकान में ही निहित है!
रसूलपुर गाँव में सुखिया काकी का बहुत ही बोलबाला है काकी ही पूरे गाँव की हेड है! बुलन्द आवाज,दोहरी कद-काठी साँवला रंग,नैन नक्स बहुत ही खूबसूरत!
बुढ़ापा उम्र काआ गया काकी के पर चेहरे से जान नहीं पड़ता कि काकी इतने बरस की हो गयी है
काकी का कहना भी तो है जब तक गाड़ी में पेट्रोल रहेगा तभी तक तो गाड़ी चलेगी पेट्रोल खत्म गाड़ी अपने आप रुक जायेगी! सच काकी के चेहरे पर दमकती खूबसूरत का यही राज है!
खान-पान का नियमित ध्यान जितना काम वो आज भी इस उम्र में करती है उतना जवान औरतों के बस की बात नहीं!
सच!सुबह चार बजे उठ जाना दुवार बटोरना,गोबर करना,पानी देना,जानवरों को नहलाना उनकी समय से देख-रेख करना काका के लिए चुकन्दर और गाजर का जूस बनाना!फिर नहा-धोकर पूजा-पाठ करना तब जाकर रसोई में प्रवेश करना!इन कामों से फुरसत मिलें तब काकी दरने,फोरने जुट जाती अनाजों को कहीं दाल तो कही दलिया बनाने में व्यस्त काकी को खाली बैठते कोई ना देखा था!
काकी का कहना था जहाँ चार ठू मेहरियाँ जुटत हैं हूहाँ पंचचौरा होत है केवल फिर कउनौ बात मुँह से निकरि आवै तो ..लेव मजा झोटी के झोटा होय फिर एहेसे अच्छा आपन काम में लाग रहौ सबसे नीक!
काकी से कोई मुँह लड़ा भी नहीं सकता था पूरा मुहल्ला जगमग रहता बस चाची की एक आवाज से बहुत ही सह्रदय,दयालु थीं!
दूसरों के दु:ख में सदैव सबसे पहले शामिल!
पर कहते हैं ना कि अच्छे इंसान को हर कोई पूछता है शायद भगवान भी!
काकी की करनी इतनी अच्छी थी कि बिना कष्ट सहे एकदिन काकी इस दुनियाँ से चल बसी!
उस दिन जैसे पूरे गाँव में भूचाल आ गया हो किसी के कानों को विश्वास ही ना हो कि काकी गुजर गयी! सब यही अरे!का मजाक करत हो अबहिन काकी सुनिहैं तव हजार गारी से कम ना देहैं! पर अब काकी कहाँ दुबारा इस दुनियाँ में आने वाली!
चारों तरफ सन्नाटा पसर गया हर तरफ सूनापन !!
काका का जोड़ा बिछड़ गया! इतना ख्याल रखती थी काकी काका का!बिना काका के खाना खाये कभी काकी ने भोजन का कौर नहीं तोड़ा था!
…बच्चों से बहुत स्नेह बस मुँह की खरखर थी काकी जो कहती थी सामने पीठ पीछे नहीं!
काकी के अचानक इस तरह से गुजर जाने से हर तरफ सन्नाटा और सूनापन पसर गया है!आज सालों बीत गये वो चाकी भी चुपचाप किनारे पड़ी है जिसे काकी कभी छुट्टी नहीं देती थीं काकी की चाकी के हिस्से में कभी रविवार नहीं होता! हाँ काकी अपनी चाकी को किसी भगवान से कम नहीं समझती थी उन्होंने कबीरदास जी की पंक्तियों की तरफ अच्छे से ध्यान दिया था-पाथर पूजे यदि हरि मिलत तो मैं पूँजू पहार और घर के चाकी कोउ न पूजत जेहके पीसा कुल घर खाये!पर काकी के अन्दर ऐसा नहीं था काकी ईश्वर के साथ-साथ अपनी चाकी की भी पूजा करती थीं क्योंकि चाकी ही काकी के लिए सब कुछ थी जो काकी के काम में सहायक सिद्ध होती! लेकिन अब हर तरफ सन्नाटा है एक अजीब सा सूनापन है!
अब गाँव की स्त्रियाँ कभी छठें छमासे आ जाती है काकी की चाकी में कुछ दाल वगैरह दरने!वरना अब चाकी चुपचाप एक किनारे पड़ी रहती है क्योंकि अब काकी के बाद कोई ना बचा जो चाकी को चलाता काकी के जाने के बाद अब चाकी के जीवन में हर दिन इतवार ही नजर आता!
काकी इत्ती सी किसी चीज के लिए किसी दूसरे के घर माँगने नहीं गयीं हर चीज काकी स्वयं लाकर रखती थी काकी हमेशा कहती थी इत्ती बड़ी जिन्दगी मा हम पेट नहीं खावा मुदा गिरिसती बहुत बनावा है कि आज हमरे घर सौ आदमी आय जायें तव हमका दूसरे के हियाँ समान माँगें के जरूरत नहीं ना !
लेकिन आज चाची की गृहस्थी वीरान पड़ गयी उनके बिना!और चाकी के जीवन में भी एक अजीब सा सूनापन जिन्दगी भर के लिए पसर गया है अब कौन इस चाकी को चलाने वाला भला अब तो मिक्सी का जमाना है चाकी को तो रिटायर होना ही पड़ेगा अब चाकी के लगता 62 वर्ष पूरे हो चुके हैं!तो काम से हमेशा के लिए छुट्टी!
हाँ पेंशन के रूप में कभी-कभार कुछ धनराशि मिल जाया करेगी…गाँव की स्त्रियों के द्वारा……कुछ विशेष मौकों पर!!
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डॅा०आनन्द कुमार यादव

author anand yadav

नाम -डॅा०आनन्द कुमार यादव

जन्म- 07 जून1979

पिता – श्री लच्छ्मी प्रसाद

माता- श्रीमती ललता

शिक्षा- एम.एससी., बी.एड.,एम.ए.,पीएच.डी.(NET)

संप्रति – सहायक समन्वक(अध्यापक) BRC कमासिन, बांदा (उ०प्र०) 210125

भाषा ज्ञान – हिंदी, अग्रेज़ी लेखन – सन् 2004 से

साहित्यिक पथप्रदर्शक -माँ सरस्वती

आदर्श – मुंशी प्रेमचंद , रामविलास शर्मा, केदारनाथ अग्रवाल, मैथिलीशरण गुप्त, रॉबर्ट फ़्रॉस्ट।

साहित्यिक विधाएँ—हिंदी एवं उर्दू -गीत,ग़ज़ल, कहानी, नज़्म, दोहे, हाइकू, छंदमुक्त,आलेख, आलोचना, समालोचना, शोध-पत्र।

अंग्रेज़ी— सोनेट्स, शॉर्ट पोयम,शॉर्ट स्टोरी।

प्रकाशन -विभिन्न राष्ट्रीय एवं स्थानीय पत्र -पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित।

विशेष उपलब्धि : प्रतिष्ठित समाचार पत्र ‘दैनिक जागरण’ के तत्त्वावधान में आयोजित ‘मेरा शहर मेरा गीत’ के विजेता बनकर ‘कालि्ंजर’ की रचना करना।

अन्य उपलब्धि :  केदारनाथ अग्रवाल शोधपीठ बांदा द्वारा सम्मानित।

रामविलास शर्मा  की हिन्दी जाति सम्बन्धी अवधारणा पर व्याख्यान हेतु चि०ग्रा०वि०वि०म०प्र०से सम्मानित।

पता—राजापुर रोड़ ,कमासिन, बांदा (उ०प्र०) 210125

फ़ोन—9450227302

ईमेल-anandy071@gmail.com

कला, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र के शोधार्थियों और अध्येताओं के शोध-पत्र

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