होली का विस्तृत इतिहास और उत्पत्ति
होली भारत का एक प्रमुख त्योहार है जिसे रंगों का त्योहार भी कहा जाता है। यह वसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक है और असत्य पर सत्य की विजय का उत्सव मनाने के लिए प्रसिद्ध है। यह त्योहार विभिन्न पौराणिक कथाओं, ऐतिहासिक घटनाओं और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ा हुआ है।
होली की पौराणिक उत्पत्ति
होली से जुड़ी कई कथाएँ प्रचलित हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं:
1. प्रह्लाद और होलिका की कथा
होली का सबसे प्रसिद्ध और प्रमुख पौराणिक संदर्भ प्रह्लाद, होलिका और राजा हिरण्यकश्यप की कहानी से जुड़ा है।
हिरण्यकश्यप एक शक्तिशाली असुर राजा था, जिसे भगवान ब्रह्मा से ऐसा वरदान मिला था कि उसे न मनुष्य मार सकता था, न पशु; न दिन में, न रात में; न घर में, न बाहर; न किसी अस्त्र से, न शस्त्र से। इस वरदान के कारण वह अभिमानी हो गया और खुद को भगवान मानने लगा। उसने अपने राज्य में भगवान विष्णु की पूजा पर प्रतिबंध लगा दिया, लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद विष्णु का अनन्य भक्त था।
हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रह्लाद को विष्णु-भक्ति छोड़ने के लिए कई यातनाएँ दीं, लेकिन वह अपनी भक्ति पर अडिग रहा। अंततः हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका की मदद ली, जिसे आग में न जलने का वरदान प्राप्त था। होलिका ने प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में बैठने का निर्णय लिया, ताकि वह जल जाए और होलिका सुरक्षित रहे।
लेकिन जैसे ही आग जली, होलिका जलकर भस्म हो गई, जबकि प्रह्लाद सुरक्षित बच गया। यह घटना यह दर्शाती है कि असत्य और अन्याय का अंत निश्चित है। इसी उपलक्ष्य में होली से एक दिन पहले होलिका दहन किया जाता है, जो बुराई के अंत का प्रतीक है। अगले दिन रंगों के साथ होली खेली जाती है।
2. राधा-कृष्ण की प्रेम कथा
होली का एक और प्रमुख संदर्भ भगवान कृष्ण और राधा की प्रेम कथा से जुड़ा है।
भगवान श्रीकृष्ण का रंग काला था, जबकि राधा और गोपियाँ गोरी थीं। कृष्ण अक्सर अपनी माँ यशोदा से शिकायत करते थे कि राधा इतनी गोरी क्यों हैं और वह इतने साँवले क्यों हैं। तब यशोदा ने हंसते हुए सुझाव दिया कि कृष्ण राधा पर रंग लगा दें और उन्हें अपने जैसा बना लें।
कृष्ण ने ऐसा ही किया और राधा पर रंग डाल दिया। तभी से होली में रंग खेलने की परंपरा शुरू हुई। आज भी मथुरा, वृंदावन, बरसाना और नंदगांव में होली विशेष रूप से मनाई जाती है, जहाँ लट्ठमार होली खेली जाती है। इसमें महिलाएँ पुरुषों को रंग लगाकर मजाक में डंडों से मारती हैं, और पुरुष खुद को ढाल से बचाते हैं।
3. कामदेव और भगवान शिव की कथा
एक अन्य प्रसिद्ध कथा भगवान शिव और कामदेव से जुड़ी हुई है।
जब माता सती ने आत्मदाह कर लिया, तो भगवान शिव गहरे ध्यान में चले गए। इस दौरान, दुनिया में असंतुलन फैल गया। देवताओं ने कामदेव (प्रेम के देवता) से प्रार्थना की कि वे शिव को ध्यान से बाहर लाएँ।
कामदेव ने अपने पुष्प बाण से भगवान शिव पर प्रहार किया। इससे शिव का ध्यान भंग हो गया, लेकिन उन्होंने क्रोधित होकर अपनी तीसरी आँख खोल दी और कामदेव जलकर भस्म हो गए।
बाद में, कामदेव की पत्नी रति ने भगवान शिव से विनती की, जिससे शिव ने कामदेव को अमर रूप में पुनः जीवनदान दिया। इस घटना को प्रेम और बलिदान के प्रतीक के रूप में देखा जाता है, और दक्षिण भारत में होली को कामदेव के सम्मान में मनाया जाता है।
होली का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व
होली का उल्लेख ऋग्वेद, नारद पुराण, भविष्य पुराण और अन्य हिंदू ग्रंथों में मिलता है। यह त्यौहार गुप्त साम्राज्य (4वीं-6वीं शताब्दी ई.) के समय से मनाया जाता रहा है।
मुगल काल में भी होली का उत्सव बहुत भव्य तरीके से मनाया जाता था। अकबर और जहाँगीर ने अपने दरबार में होली खेलने की परंपरा रखी थी।
आज के समय में होली का उत्सव
आज भारत और दुनिया भर में होली को विभिन्न रूपों में मनाया जाता है:
- उत्तर भारत: मथुरा, वृंदावन, बरसाना और कान्हा की होली प्रसिद्ध है।
- पश्चिम भारत: महाराष्ट्र में मटकी फोड़ की परंपरा होती है, जहाँ युवक दही हांडी फोड़ते हैं।
- पूर्व भारत: पश्चिम बंगाल में इसे डोल जात्रा कहा जाता है, जहाँ राधा-कृष्ण की मूर्तियाँ सजाकर शोभायात्रा निकाली जाती है।
- दक्षिण भारत: तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में इसे कामदेव की पूजा के रूप में मनाया जाता है।
निष्कर्ष
होली केवल रंगों का त्यौहार नहीं है, बल्कि यह प्रेम, भक्ति, बुराई पर अच्छाई की जीत और आपसी भाईचारे का प्रतीक है। यह त्यौहार हमें खुशियाँ बाँटने, दुश्मनी भूलने और प्रेम एवं सद्भावना बढ़ाने की प्रेरणा देता है।
"बुरा न मानो, होली है!"