कवि - अटल बिहारी वाजपेयी
डॉ- एन. लावण्या
Abstract
कवि और राजनीतिक नेता अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रमुख नेता थे और भारतीय राजनीति के प्रसिद्ध चेहरे रहे। सक्रिय राजनीतिक जीवन के साथ-साथ कवि भी थे और उनकी कविताएँ और प्रेरणादायक भाषणों के लिए वे प्रसिद्ध रहे। उनका साहित्य आत्मकथा, ऐतिहासिक, सामाजिक, धार्मिक, राष्ट्रीय और विचारों पर आधारित है। उनकी लेखनी से उम्मीद होता था और उन्होंने भारतीय संस्कृति और इतिहास के प्रति अपनी अद्भुत दृष्टि को साझा किया। वे भारतीय संस्कृति, सभ्यता और परंपराओं को विशेष रूप से मानते थे । वाजपेयी जी की कविताएँ और लेखन कृतियों में एक मतलबपूर्ण दृष्टिकोण और भावनात्मकता थी। उन्होंने राष्ट्रीय एकता और देशभक्ति के मूल मूल्यों को प्रोत्साहित किया और अपनी रचनाओं में इसे व्यक्त किया। अटल बिहारी वाजपेयी जी की कविताओं में मानवतावाद का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से मानवता, समाजवाद और समरसता के महत्व को बहुत गहराई से दिखाया है। उनकी कविताओं में सभ्यता, न्याय, समाजसेवा और सामाजिक न्याय के मुद्दे उठाए गए हैं। उन्होंने वास्तविकता की ओर ध्यान दिया और मानवता के मूल्यों को सराहा है। उनकी कविताओं में मानवतावाद की भावना बहुत गहराई से प्रकट होती है और इससे हमें समाज में अच्छाई की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग दिखाता है।
Keywords - अटल
बिहारी वाजपेयी, भारतीय संस्कृति और इतिहास, राष्ट्रीय एकता और देशभक्ति, मानवता, समाजवाद और समरसता ।
कवि - अटल बिहारी वाजपेयी
कवि और राजनीतिक नेता अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रमुख नेता थे और भारतीय राजनीति के प्रसिद्ध चेहरे रहे। वे भारतीय जनसंघ के सह-संस्थापक और भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री भी रहे। वह सक्रिय राजनीतिक जीवन के साथ-साथ कवि भी थे और उनकी कविताएँ और प्रेरणादायक भाषणों के लिए वे प्रसिद्ध रहे। उनकी राजनीतिक दक्षता और कला के क्षेत्र में कार्यकुशलता का संगम वे विशेष बनाते हैं।
अटल बिहारी वाजपेयी की साहित्यिक यात्रा भी खास है। उन्होंने कविताएँ, गाने, विचार, विचार-संग्रह, किवल, चिंतन, दृश्य और कहानियों की रचनाएँ की थी। उनका साहित्य आत्मकथा, ऐतिहासिक, सामाजिक, धार्मिक, राष्ट्रीय और विचारों पर आधारित है। उनकी लेखनी से उम्मीद होता था और उन्होंने भारतीय संस्कृति और इतिहास के प्रति अपनी अद्भुत दृष्टि को साझा किया। वे भारतीय संस्कृति, सभ्यता और परंपराओं को विशेष रूप से मानते थे ।
वाजपेयी जी की कविताएँ और लेखन कृतियों में एक मतलबपूर्ण दृष्टिकोण और भावनात्मकता थी। उन्होंने राष्ट्रीय एकता और देशभक्ति के मूल मूल्यों को प्रोत्साहित किया और अपनी रचनाओं में इसे व्यक्त किया। उनका कहना है कि यहाँ रुचिर से कला पक्ष का और आह्वादन से भाव ग्रहण है। इस लक्षण में साहित्य की अन्य विधाओं का भी बोध होता है अत लक्षण अतिव्याप्तिदोष से परिपूर्ण है।' अलंकार और अलंकार्य की व्याख्य उदात्त अलंकारों का महत्व हाशिये पर ला दिया गया है।
वाजपेयी जी की कविताएँ भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों के जीवन में गहराई से प्रवेश करती हैं और भारतीय समाज के विभिन्न पहलुओं को समर्थन देती हैं। उनकी कविताएँ समाज में सामाजिक न्याय, समरसता, सत्य, और मनवता के मूल्यों को समर्थन करती हैं और राष्ट्रीय एकता और सामरिक समरसता की महत्वपूर्णता को उजागर करती हैं।
अटल के काव्य संसार का संक्षिप्त परिचय-
अटल बिहारी 1939 ई० से काव्य सृजन के सारस्वत अनुष्टान में लग हैं। 1939 ई० में ग्वालियर के विक्टोरिया कालेजिएट हाईकूल की कालेज प में अटल की पहली कविता 'कवि आज सुना वह गान रे' प्रकाशित हुई थी। समय अटल कक्षा नौ के विद्यार्थी थे। तब से आज तक अटल बिहारी के काव्य संकलन प्रकाशित हो चुके है। अटल जी के काव्य संसार में महाकाव्य नहीं है और न ही कोई खण्ड काव्य है। इसके बावजूद उनकी ज कविताएं हैं वे स्वतन्त्रतापूर्व व स्वातन्त्रयोत्तर भारत की जीती-जागती तस्वी 'युगबोध' से व्याप्त ये कविताएं कवि को युगों-युगों तक जीवित रखने हैं। अटल जी की कविताओं के जो संकलन प्रकाशित हुए हैं, उनका स परिचय अग्राँकित है।
मेरी इक्यावन कविताएँ-
अटल बिहारी की इक्यावन कविताओं का पहला संकलन मेरी इक कविताएँ' शीर्षक से किताब घर प्रकाशन, 4855-56/24 अंसारी रोड़, दरिया नई दिल्ली- 110002 से प्रकाशित हुआ है। इसका पहला संस्करण जून ई० में प्रकाशित हुआ था। मेरे पास इसका तेईसवाँ संस्करण है, जो प 2006 में प्रकाशित है। इसके संपादक श्री चन्द्रिका प्रसाद शर्मा सी-10, के महानगर लखनऊ-226006 हैं। इसकी पहली कविता 'आओ फिर से जलाएँ तथा अन्तिम कविता 'सपना टूट गया' है। प्रथम कविता की पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं-
"भरी दुपहरी में अंधियारा, सूरज परछाईं से हारा,
अन्तरतम का नेह निचोड़ें, बुझी हुई बाती सुलगाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ।
आहुति बाकी, यज्ञ अधूरा, अपनों के विघ्नों ने घेरा,
अंतिम जय का वज्र बनाने, नव दधीचि हड्डियाँ गलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ।।
न दैन्यं न पलायनम्' :
'न दैन्यं न पलायनम्' कविता संग्रह के सम्पादक डॉ. चन्द्रिका प्रसाद शर्मा जी इस काव्य संग्रह की कविताओं के सन्दर्भ में प्रकाश डालते हुये लिखते हैं कि कवि-प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी की कविताओं का यह संग्रह पाठकों के हाथों में सौंपते हुए मुझे विशेष हर्ष का अनुभव हो रहा है। उनका पहला कविता-संग्रह 'मेरी इक्यावन कविताएँ ऐसा लोकप्रिय हुआ कि कुछ ही समय में उसके नौ संस्करण हाथोंहाथ बिक गए। देश की अन्य कई भाषाओं में उसका अनुवाद भी प्रकाशित हो गया। बलगारियन भाषा में भी कविताएँ अनूदित हो गई। संगीत-जगत की कई महत्वपूर्ण हस्तियों ने अटल जी की कविताओं को संगीत बद्ध करके कैसेटों में भरकर देश के सम्मुख प्रस्तुत किया। उक्त कृति के संपादक के नाते मेरे उत्साह का बढ़ना स्वाभाविक था। अस्तु मैंने उनकी अन्य कविताओं को इकट्ठा करना शुरू कर दिया। कविताओं को एकत्रित करके पाण्डुलिपि उन्हें दिखाकर प्रकाशन की अनुमति प्राप्त कर ली।
प्रधानमंत्री के व्यस्तता-भरे जीवन में उन्होंने मुझे समय दिया, इसके लिए मैं उनसे आशीर्वाद-प्राप्ति की ही कामना करता हूँ। मैंने पाया कि उनके मानस में बैठा कवि साहित्य-चर्चा के समय अपने प्रधानमंत्री पद को कुछ क्षणों के लिए भूल जाता है और साहित्य-रस में अपने को निमग्न कर लेता है। प्रस्तुत संग्रह को चार खंडों में विभक्त किया गया है-आस्था के स्वर, चिन्तन के स्वर, आपातकाल के स्वर तथा विविध स्वर। 'आस्था के स्वर' खंड में राष्ट्रीय अस्मिता, राष्ट्रभाषा तथा दर्शन विषयक कविताएँ प्रस्तुत की गई हैं। 'चिन्तन के स्वर' खंड के अंतर्गत विचार-प्रधान और युगबोध संबंधी कविताएँ दी गई हैं। 'आपातकाल के स्वर खंड में देश में शासन द्वारा लगाए गए आपातकाल के दिनों में कवि द्वारा भोगे गए यथार्थ से संबंधित कुण्डलियाँ प्रस्तुत की गई हैं और 'विविध स्वर' खंड में विभिन्न विषयों पर लिखी गई कविताएँ दी गई है। आस्था के स्वर में संकलित कविता 'न दैन्यं न पलायनम्' कविता की अग्रिम पंक्तियां अवलोकनीय है ।
"हमें ध्येय के लिए जीने, जूझने और
आवश्यकता पड़ने पर मरने के संकल्प को दो हराना
है।
आग्नेय परीक्षा के इस घड़ी में
आइये
अर्जुन की तरह उद्घोष करें- 'न दैन्यं न पलायनम्
कैदी कविराय की कुण्डलियाँ :
“ कैदी कविराय की कुण्डलियाँ” अटल बिहारी के जेल जीवन में रचित कविताओं का प्रसिद्ध संकलन है। इसका सम्पादन श्री दीनानाथ मिश्र ने किया है। इस काव्य संकलन में अटल की 70 कुण्डलियाँ को संकलित किया गया है। अटल जी ने आपातकाल के बंदी जीवन में अपने कवि का पल्ला पकड़ा थाउन्नीस महीनो के उस कैदी जीवन में उनके कवि ने उनका पूरा-पूरा साथ दिया. और उन्होंने जेल में 70 कुण्डलियां रचीं। उन दिनों कूछ गीतों की भी रचना उन्होंने की थी। उनकी कुण्डलियां को प्रसिद्ध पत्रकार श्री दीनानाथ मिश्र ने संपादित कर हिन्दी पाठकों के साथ बहुत बड़ा उपकार किया है। जहाँ एक ओर ये कुण्डलियां एक विशेष स्याह कालखण्ड के बारे में एक रोजनामचा प्रस्तुत करती हैं, वहीं दूसरी ओर ये एक उस छंद विधा का स्मरण कराती हैं, जिसमें गिरधर कविराय और दीनदयाल गिरि आदि ने नीति-विषयक रचनाएँ रची थीं।
अटल जी की यह कृति हिन्दी कुण्डलियाँ-साहित्य में विशेष स्थान पाने का अधिकार रखती है; क्योंकि आजकल के कवि एक तो छंदोबद्ध कविता लिख ही नहीं पाते; दूसरे, कुण्डलियाँ लिखना एक टेढ़ी खीर है।'कैदी कविराय की कुण्डलियाँ' पुस्तक के संपादक श्री दीनानाथ मिश्र ने 'अपनी बात' लिखते हुए जो लिखा है,"कुछ ही हफ्ते पहले अटल जी विदेशमंत्री बने थे। मैं मिलने गया था। बात जेल जीवन के दौरान पढ़ने-लिखने की चल रही थी। बीच में अटल जी उठे और एक फाइल ले आए। उन्होंने फाइल की कोई पचास कुण्डलियाँ मुझे पढ़ने को दी। पढ़ने के बाद मैंने कहा कि इनका संकलन छपना चाहिए। राजनीति की ये व्यंग्य-कविताएँ देखने में छोटी और सपाट-सी थीं, परन्तु 'मार करे गंभीर' वाली उक्ति चरितार्थ करती थीं। पर अटल जी छपाई के प्रति उदासीन थे। उनकी आदत में शुमार हो चुकी उदासीनता का ही यह परिणाम है कि उनके अनगिनत विचारपूर्ण भाषण आज हवा में विलीन हो चुके हैं। जो इक्का-दुक्का भाषण-संकलन छपे भी हैं, वे उनका आंशिक प्रतिनिधित्व ही करते है। जेल जीवन की ये रचनाएँ उनकी उदासीनता के कारण बिखरें नहीं, यह मेरी इच्छा थी' कविता-संकलन छपने से वे चोटी के कवियों में प्रतिष्ठित हो जाएँगे, न यह मेरी मान्यता न उनकी कविताई की ही यह मंशा थी। 19 महीनों की काली रात के ऐतिहासिक कालखण्ड में अटल जी जैसे राजनेता की कुण्डलियों में व्यक्त हुई प्रतिक्रियाओं का जहाँ अपना एक राजनीतिक महत्व है, वहीं साहित्यिक महत्व भी है। एक अर्थ में ये जनसामान्य के साथ स्पन्दित एक संवेदनशील हृदय की वे धड़कनें हैं, जो देश के जागृत मानस के घुटन और आक्रोश, पीड़ा और पराक्रम, वर्तमान के प्रति उनके राजनीतिक मन और भविष्य का प्रबोध, दुर्जेय तानाशाही का एहसास और अजेय जनशक्ति का आत्मविश्वास, समाज के सामूहिक तनाव का रेखाचित्र और आहत उत्तेजनाओं की विराट क्षमताओं का साक्षात्कार है। पर मैं सिर्फ उसके दस्तावेजी और राजनीतिक महत्व के तर्क से अपना आग्रह दुहराता रहा। उनका जबाब था
'टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते।
सत्य
का संघर्ष सत्ता से, न्याय लड़ता निरकुशता से,
अंधेरे ने दी चुनौती हैकिरण अंतिम अस्त होती
है।
दीप निष्ठा का लिए निष्कंप,
वज्र टूटे या उठे भूकंप, यह बराबर का नहीं है
युद्ध, हम निहत्थे, शत्रु है सन्नद्ध
हर
तरह के शस्त्र से है सज्ज,
और पशु-बल हो उठा निर्लज्ज ।
किंतु
फिर भी जूझने का प्रण,
पुनः अंगद ने बढ़ाया चरण।
प्राण-पण से करेंगे प्रतिकार, समर्पण की मांग
अस्वीकार।
दांव पर सब कुछ लगा हैरुक नहीं सकते,
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते।
आपातकाल के कैदी जीवन को जीते हुए अटल जी ने 70 कुण्डलियों की रचना की। उनकी ये कुंडलियां हिन्दी साहित्य की विशेष निधि हैं। इन कुण्डलियों में अटल जी ने तत्कालीन परिस्थितियों का यथार्थ और व्यंग्यपूर्ण खाका समेटा हैं'संस्कृति की नैया' शीर्षक कविता में मंत्रिपद की खूबी पर करारा व्यंग्य देखिये-
"पैंट और बुश-शर्ट से, जनता हो गई क्रुद्ध।
धोती कुर्ता छोड़कर, पहने वस्त्र अशुद्ध
पहने वस्त्र अशुद्ध, मंत्रिपद की यह खूबी।
संस्कृति की नैया, सागर के जल में डूबीकह
कैदी कविराय, लगाओ सिर्फ लंगोटी।
पैरों मध्य खड़ाऊँ, सर पर मोटी चोटी।
अटल जी का मानना है कि उनकी कविता को जेल यात्राओं ने काफी कुछ जिन्दा रखा है। जाहिर है, वहाँ उन्हें सोचने, चिन्तन-मनन करने का समय अधिक मिलता रहा है। उन्होंने उन जेल यात्राओं का सघन रचनात्मक उपयोग किया। कभी उन स्थितियों पर चुटकी भी ली ।
अटल बिहारी वाजपेयी जी की कविताओं में मानवतावाद का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से मानवता, समाजवाद और समरसता के महत्व को बहुत गहराई से दिखाया है। उनकी कविताओं में सभ्यता, न्याय, समाजसेवा और सामाजिक न्याय के मुद्दे उठाए गए हैं। उन्होंने वास्तविकता की ओर ध्यान दिया और मानवता के मूल्यों को सराहा है। उनकी कविताओं में मानवतावाद की भावना बहुत गहराई से प्रकट होती है और इससे हमें समाज में अच्छाई की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग दिखाता है।
अटल बिहारी वाजपेयी जी की कविताओं में देश भक्ति का अद्भुत परिचय मिलता है। उनकी कविताएँ देश के लिए उत्कृष्ट समर्पण और समर्थन का परिचय करती हैं। उनकी कविताओं में वीर रस और प्रेरणादायक भावनाएं भरी होती हैं जो देशभक्ति की भावना को उत्कृष्ट ढंग से प्रकट करती हैं। वे अपनी कविताओं में देश के विभिन्न पहलुओं को छूने की कोशिश करते हैं और लोगों को राष्ट्रीयता और सामर्थ्य की भावना से जोड़ने का प्रयास करते हैं। उनकी कविताएँ देशभक्ति और समर्पण की भावना से ओतप्रोत होती हैं और लोगों को देश के प्रति गहरी समर्पण और सेवाभाव की भावना से जुड़ने की प्रेरणा देती हैं।
संदर्भ ग्रंथ
१.
कवि राजनेता अटल बिहारी बाजपेयी,
सं० चन्द्रिका प्रसाद
२.
राजनीति के शिखर कवि अटल बिहारी वाजपेयी – डॉ. सुनील
जोगी
३.
मेरी इक्यावन कविताएँ – अटल बिहारी वाजपेयी
४.
न देन्यं न पलायनम – अटल बिहारी वाजपेयी
५.
कैदी कविराय की कुण्डलियां अटल बिहारी बाजपेयी
डॉ- एन. लावण्या
सहायक प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष
एतिराज महिला महाविद्यालय
चेन्नई , तमिलनाडु